धान की अच्छी पैदावार के लिए किसान अक्सर यूरिया और डीएपी पर ज्यादा ध्यान देते हैं, लेकिन पोटाश भी फसल के लिए बहुत जरूरी पोषक तत्व है। समस्या तब होती है जब पोटाश बिना मिट्टी की जरूरत समझे या गलत समय पर डाल दिया जाता है।
धान में पोटाश डालने का एक ही समय हर खेत के लिए सही नहीं होता। मिट्टी, धान की किस्म, रोपाई या बुवाई की विधि और खाद की पूरी मात्रा के हिसाब से समय तय करना चाहिए। सही तरीका अपनाने से खाद का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है और फसल को मजबूत बनाने में मदद मिलती है।
धान में पोटाश आखिर क्यों जरूरी है
पोटाश धान के पौधे की कई जरूरी प्रक्रियाओं में काम करता है। यह पौधे में पानी के संतुलन, पोषक तत्वों के इस्तेमाल और पौधे की मजबूती से जुड़ा होता है। पर्याप्त पोटाश मिलने पर पौधा कई तरह के तनाव को बेहतर तरीके से सहन कर सकता है।
पोटाश की जरूरत सिर्फ दाना बनने के समय नहीं होती। फसल के शुरुआती विकास से लेकर आगे की बढ़वार तक इसकी भूमिका रहती है। इसी वजह से खेत में पोटाश की कमी हो तो केवल बाद में खाद डालने से हर बार पूरी समस्या ठीक नहीं होती।
पोटाश डालने की सबसे बड़ी गलती क्या है
सबसे बड़ी गलती यह मान लेना है कि हर खेत में पोटाश एक ही मात्रा और एक ही समय पर डालना चाहिए। कृषि विशेषज्ञों की सलाह में भी धान की स्थिति और मिट्टी के अनुसार पोटाश के इस्तेमाल में अंतर मिलता है।
कई जगह धान में पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के समय देने की सलाह दी जाती है। वहीं हल्की मिट्टी या कुछ खास खेती की परिस्थितियों में पोटाश को दो हिस्सों में देने की सिफारिश भी मिलती है। इसलिए बिना जरूरत समझे पूरी खाद को बहुत देर से डालना सही तरीका नहीं माना जा सकता।
एक दूसरी गलती यह है कि किसान यूरिया की मात्रा बढ़ाकर पोटाश की जरूरत को नजरअंदाज कर देते हैं। धान में केवल नाइट्रोजन बढ़ाने से संतुलित पोषण नहीं मिलता। मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्व और फसल की वास्तविक जरूरत को ध्यान में रखना ज्यादा जरूरी है।
धान में पोटाश डालने का सही समय कब है
पोटाश का सही समय खेती की स्थिति पर निर्भर करता है। सामान्य तौर पर धान की खेती में पोटाश की मात्रा का बड़ा हिस्सा शुरुआत में, यानी खेत की तैयारी या रोपाई के आसपास देना उपयोगी माना जाता है। कुछ परिस्थितियों में बची हुई मात्रा को बाद की महत्वपूर्ण अवस्था में दिया जाता है।
ICAR की 2025 की खरीफ कृषि सलाह में कुछ धान क्षेत्रों के लिए फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के समय देने की सलाह दी गई है। दूसरी ओर, भारतीय चावल अनुसंधान से जुड़े कुछ कृषि प्रयोगों में हल्की मिट्टी और कुछ खास खेती की स्थितियों में पोटाश को अलग-अलग अवस्थाओं में देने की व्यवस्था अपनाई गई है। इसका मतलब साफ है कि पूरे देश के हर खेत के लिए एक ही फार्मूला लागू नहीं किया जा सकता।
| खेती की स्थिति | पोटाश देने का सामान्य तरीका |
|---|---|
| सामान्य रोपाई वाली धान की खेती | कई सिफारिशों में पूरी पोटाश मात्रा बेसल यानी रोपाई के समय देने की सलाह |
| हल्की या रेतीली मिट्टी | कुछ परिस्थितियों में पोटाश को दो हिस्सों में देना बेहतर हो सकता है |
| अधिक अवधि वाली या विशेष किस्म की खेती | स्थानीय कृषि सिफारिश के अनुसार समय तय करना चाहिए |
| मिट्टी में पोटाश की कमी | मिट्टी जांच के आधार पर मात्रा और समय तय करना सबसे सुरक्षित तरीका है |
यहां यह समझना जरूरी है कि पोटाश की सही मात्रा केवल धान देखकर तय नहीं की जानी चाहिए। मिट्टी में पहले से कितना पोटाश मौजूद है, पिछली फसल में कौन सी खाद दी गई थी और धान की किस्म क्या है, इन बातों का भी असर पड़ता है।
अगर पोटाश दो बार देना हो तो कब दें
कुछ खेती की परिस्थितियों में पोटाश को दो हिस्सों में देने की व्यवस्था अपनाई जाती है। ऐसे मामलों में पहली मात्रा बेसल यानी रोपाई के समय दी जाती है और दूसरी मात्रा फसल की आगे की महत्वपूर्ण बढ़वार के दौरान दी जा सकती है।
भारतीय चावल अनुसंधान से जुड़े कृषि अध्ययनों में कुछ परिस्थितियों में पोटाश को शुरुआती मात्रा के साथ बाद की फसल अवस्था में देने की व्यवस्था अपनाई गई है। कुछ शोधों में अधिक पोटाश देने वाली हल्की मिट्टी की स्थितियों में बाद की अवस्था में पोटाश देने से पोषक तत्वों के इस्तेमाल और उपज में लाभ देखा गया है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर किसान अपनी पूरी पोटाश खाद को दो या तीन बार बांट दे। खेत की मिट्टी और स्थानीय सिफारिश को देखकर ही ऐसा करना चाहिए।
पोटाश की कितनी मात्रा डालें
पोटाश की मात्रा के बारे में सबसे जरूरी बात यह है कि पूरे देश के लिए एक ही मात्रा तय नहीं है। अलग-अलग क्षेत्र, मिट्टी, धान की किस्म और खेती की पद्धति के अनुसार खाद की जरूरत बदल सकती है।
उदाहरण के लिए, ICAR की खरीफ कृषि सलाह में कुछ क्षेत्रों के लिए धान में 80:40:20 किलोग्राम N:P:K प्रति हेक्टेयर जैसी सिफारिश दी गई है। वहीं दूसरे क्षेत्रों और अलग परिस्थितियों में पोटाश की मात्रा इससे अलग हो सकती है। इसलिए केवल किसी दूसरे किसान के खेत में इस्तेमाल हुई मात्रा देखकर अपने खेत में उतनी ही खाद डालना सही तरीका नहीं है।
मिट्टी की जांच के आधार पर खाद देना ज्यादा सुरक्षित है। इससे जरूरत से ज्यादा खाद डालने का खर्च भी बच सकता है और मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है।
पोटाश डालते समय इन बातों का रखें ध्यान
पोटाश का इस्तेमाल करते समय केवल खाद की मात्रा ही नहीं, बल्कि खेत की हालत और देने का तरीका भी महत्वपूर्ण है।
- मिट्टी की जांच के आधार पर खाद की मात्रा तय करें।
- रोपाई के समय दी जाने वाली पोटाश की मात्रा को स्थानीय सिफारिश के अनुसार रखें।
- हल्की मिट्टी में पोटाश को बांटकर देने की जरूरत हो सकती है, इसलिए स्थानीय कृषि सलाह को नजरअंदाज न करें।
- जरूरत से ज्यादा यूरिया डालकर पोटाश की कमी को पूरा करने की कोशिश न करें।
पोटाश डालने के बाद खेत में पानी और खाद की स्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए। बहुत ज्यादा पानी का जमाव या गलत सिंचाई व्यवस्था पौधे की जड़ों और पोषक तत्वों के इस्तेमाल को प्रभावित कर सकती है।
सिर्फ पोटाश डालने से ही फसल नहीं बदलेगी
कई किसान सोचते हैं कि पोटाश डालते ही धान की फसल में बड़ा बदलाव दिखाई देने लगेगा। ऐसा जरूरी नहीं है। फसल की अच्छी बढ़वार के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और जरूरत के दूसरे पोषक तत्वों का संतुलन जरूरी है।
ICAR की हाल की कृषि सलाह में भी मिट्टी की जांच के आधार पर संतुलित खाद देने पर जोर दिया गया है। इसका सीधा मतलब है कि खेत में जिस पोषक तत्व की जरूरत नहीं है, उसकी अतिरिक्त मात्रा डालने के बजाय जिस तत्व की कमी है, उसकी सही मात्रा देना ज्यादा जरूरी है।
धान की अच्छी फसल के लिए पानी का सही प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, पौधों की सही संख्या और समय पर खाद देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पोटाश इन सभी कामों का विकल्प नहीं है।
किसान के लिए सबसे जरूरी बात
अगर आप धान में पोटाश डालने की तैयारी कर रहे हैं तो सबसे पहले यह पता करें कि आपके खेत की मिट्टी में पोटाश की स्थिति कैसी है। इसके बाद धान की किस्म और खेती की विधि के हिसाब से स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञ की सिफारिश देखें।
एक सामान्य नियम के रूप में पोटाश को बहुत देर से देने के बजाय फसल की जरूरत के अनुसार शुरुआती अवस्था में देना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। लेकिन कुछ हल्की मिट्टी और विशेष परिस्थितियों में इसकी मात्रा को बांटकर देना भी उचित हो सकता है। इसलिए कैलेंडर देखकर नहीं, बल्कि खेत की जरूरत देखकर फैसला करना बेहतर है।
धान में पोटाश को नजरअंदाज करना भी गलती है और बिना जरूरत ज्यादा पोटाश डालना भी सही नहीं है। सबसे बड़ी बात खाद की सही मात्रा, सही समय और मिट्टी की जरूरत को समझना है।
कई धान क्षेत्रों में पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के समय देने की सिफारिश की जाती है, जबकि कुछ परिस्थितियों में इसे हिस्सों में देने का तरीका अपनाया जाता है। इसलिए अपने खेत के लिए सही तरीका चुनते समय मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि सिफारिश को प्राथमिकता दें। सही पोषण प्रबंधन से खाद का खर्च नियंत्रित रखने और धान की फसल को बेहतर तरीके से विकसित करने में मदद मिल सकती है।


