धान की फसल में ज्यादा और मजबूत कल्ले निकलना अच्छी पैदावार के लिए बहुत जरूरी माना जाता है। लेकिन केवल ज्यादा यूरिया डालने से कल्ले नहीं बढ़ते। सही समय पर निराई-गुड़ाई, संतुलित खाद और पानी का सही प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है।
रोपाई के करीब 30 दिन बाद फसल की बढ़वार पर खास ध्यान देना चाहिए। इसी समय खेत में खरपतवार, पोषक तत्वों की कमी और पानी की स्थिति को देखकर जरूरी काम करने से पौधों की बढ़वार को बेहतर रखने में मदद मिल सकती है।
रोपाई के 30वें दिन सबसे पहले खेत की स्थिति देखें
30 दिन के आसपास धान की फसल में कल्ले निकलने की अवस्था चल रही होती है। इस समय किसान को पूरे खेत का ध्यान से निरीक्षण करना चाहिए।
सबसे पहले यह देखें कि पौधों की बढ़वार एक जैसी है या नहीं। कहीं पौधे कमजोर हैं, कहीं ज्यादा घने हैं या किसी हिस्से में पानी लगातार जमा है, तो उस समस्या को पहले ठीक करना जरूरी है।
कल्ले कम निकलने का कारण केवल खाद की कमी नहीं होता। पौधों की संख्या, रोपाई की गहराई, खरपतवार, पानी और मिट्टी की स्थिति भी इसका कारण हो सकती है।
पहला काम: खेत से खरपतवार हटाएं
रोपाई के लगभग 30 दिन बाद खेत में खरपतवार दिखाई दे रहे हैं तो उन्हें नियंत्रित करना जरूरी है।
खरपतवार धान के पौधों के साथ पानी, पोषक तत्व, रोशनी और जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। अगर खेत में खरपतवार ज्यादा हैं तो धान को उपलब्ध पोषक तत्वों का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
ICAR की Modified SRI तकनीक में भी रोपाई के 10, 20 और 30 दिन बाद यांत्रिक निराई-गुड़ाई की व्यवस्था बताई गई है। इससे यह समझ आता है कि शुरुआती अवस्था में खरपतवार प्रबंधन को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अगर खेत में खरपतवार ज्यादा हैं तो पहले उनकी स्थिति पहचानें और धान की अवस्था के अनुसार उचित निराई या खरपतवार नियंत्रण का तरीका अपनाएं।
दूसरा काम: यूरिया डालने से पहले फसल को समझें
कल्ले कम दिखाई देने पर कई किसान तुरंत ज्यादा यूरिया डाल देते हैं। लेकिन यह तरीका हर खेत में सही नहीं है।
धान को नाइट्रोजन की जरूरत होती है, लेकिन जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देने से फायदा होने के बजाय नुकसान भी हो सकता है। इससे खेती की लागत बढ़ सकती है और पौधों में जरूरत से ज्यादा कोमल बढ़वार होने पर कुछ समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
ICAR की कृषि सलाह में धान में नाइट्रोजन को एक साथ देने के बजाय फसल की अवस्था के अनुसार अलग-अलग हिस्सों में देने की बात बताई गई है। कुछ क्षेत्रों की सलाह में रोपाई के करीब 3 और 6 सप्ताह बाद नाइट्रोजन की बची मात्रा देने का तरीका भी दिया गया है।
इसलिए 30वें दिन खाद की मात्रा तय करते समय मिट्टी, किस्म, पहले दी गई खाद और स्थानीय कृषि सलाह को ध्यान में रखना चाहिए।
- केवल कल्ले कम दिखने पर मनमाने तरीके से यूरिया न बढ़ाएं।
- मिट्टी की जांच के आधार पर खाद प्रबंधन करना बेहतर है।
- पहले दी गई खाद की मात्रा को ध्यान में रखें।
- नाइट्रोजन के साथ संतुलित पोषण पर भी ध्यान दें।
तीसरा काम: पानी को लेकर सबसे बड़ी गलती न करें
धान को पानी चाहिए, लेकिन हर समय खेत में बहुत गहरा पानी रखना जरूरी नहीं है।
रोपाई के बाद शुरुआती अवस्था में पानी का स्तर कम रखने और पौधों की बढ़वार के साथ जरूरत के अनुसार पानी बढ़ाने की सलाह दी जाती है। कुछ कृषि प्रणालियों में खेत को लगातार गहरे पानी में रखने के बजाय पानी के प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
रोपाई के 30 दिन बाद किसान को खेत की स्थिति देखकर फैसला करना चाहिए। अगर बारिश के कारण खेत पहले से पानी से भरा है तो बिना जरूरत दोबारा सिंचाई करने से बचें।
वहीं अगर खेत में पानी की कमी है और मिट्टी सूख रही है तो फसल की अवस्था और स्थानीय सलाह के अनुसार सिंचाई करें।
क्या 30वें दिन ही यूरिया डालना जरूरी है?
नहीं। 30वां दिन कोई ऐसी तय तारीख नहीं है जिस दिन हर किसान को एक जैसी मात्रा में यूरिया डालना ही पड़े।
धान की किस्म, मिट्टी, पहले दी गई खाद, रोपाई का तरीका, मौसम और फसल की स्थिति के आधार पर खाद की जरूरत बदल सकती है।
उदाहरण के लिए, ICAR की कुछ क्षेत्रीय कृषि सलाह में नाइट्रोजन की बाकी मात्रा को रोपाई के 3 और 6 सप्ताह बाद देने की व्यवस्था बताई गई है। वहीं दूसरी कृषि सलाह में नाइट्रोजन को कल्ले निकलने और बालियां बनने से पहले अलग-अलग समय पर देने की बात कही गई है।
इसलिए 30वें दिन खेत देखकर सही फैसला करना ज्यादा जरूरी है, न कि केवल कैलेंडर देखकर खाद डाल देना।
कल्ले कम हैं तो इन चीजों की जांच करें
अगर 30 दिन बाद भी पौधों में कल्ले कम दिखाई दे रहे हैं तो किसान को एक साथ कई चीजें देखनी चाहिए।
| खेत में स्थिति | संभावित कारण | क्या देखें |
|---|---|---|
| पौधे कमजोर हैं | पोषण या पानी की समस्या | मिट्टी और खाद प्रबंधन |
| खरपतवार ज्यादा है | पोषक तत्वों की प्रतिस्पर्धा | समय पर निराई |
| खेत में पानी जमा है | जल निकासी की समस्या | अतिरिक्त पानी निकालें |
| कुछ हिस्सों में पौधे कम हैं | रोपाई या पौध स्थापना की समस्या | खाली जगह और पौध संख्या |
| पत्तियों का रंग असामान्य है | पोषक तत्व या अन्य समस्या | फसल की स्थिति की जांच |
सिर्फ एक लक्षण देखकर तुरंत दवा या खाद का इस्तेमाल करना सही नहीं है।
पौधों की दूरी भी कल्ले निकलने पर असर डालती है
धान की रोपाई बहुत ज्यादा घनी होने पर पौधों के बीच जगह कम हो जाती है। इससे रोशनी, हवा, पानी और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
वहीं बहुत कम पौधे लगाने पर खेत की पूरी जगह का उपयोग नहीं हो पाता।
इसलिए रोपाई के समय सही दूरी और उचित पौध संख्या रखना महत्वपूर्ण है। ICAR की अलग-अलग धान तकनीकों में किस्म और पद्धति के अनुसार अलग-अलग दूरी की सिफारिशें दी गई हैं, इसलिए किसान को अपने क्षेत्र और किस्म के अनुसार स्थानीय कृषि सलाह का पालन करना चाहिए।
30वें दिन खेत की गुड़ाई क्यों उपयोगी हो सकती है?
अगर खेती की पद्धति और खेत की स्थिति इसकी अनुमति देती है, तो निराई-गुड़ाई से खरपतवार नियंत्रण में मदद मिल सकती है।
कुछ धान प्रणालियों में यांत्रिक निराई से मिट्टी की ऊपरी सतह में हलचल होती है और खरपतवार हटते हैं। लेकिन हर खेत में एक जैसा तरीका अपनाना जरूरी नहीं है।
जहां फसल बहुत घनी है, मिट्टी बहुत गीली है या पौधों की जड़ें आसानी से प्रभावित हो सकती हैं, वहां काम सावधानी से करना चाहिए।
सिर्फ ज्यादा कल्ले नहीं, मजबूत कल्ले जरूरी हैं
धान में केवल कल्लों की संख्या बढ़ाना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए। जरूरी यह है कि पौधे स्वस्थ रहें और उनमें बनने वाले कल्ले आगे चलकर अच्छी बालियां बनाने में सक्षम हों।
बहुत ज्यादा नाइट्रोजन देकर अत्यधिक बढ़वार कराने की कोशिश करना सही रणनीति नहीं है। संतुलित पोषण, उचित पानी और स्वस्थ पौधों पर ध्यान देना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
अगले कुछ दिनों में किन बातों पर नजर रखें?
रोपाई के 30वें दिन काम पूरा होने के बाद भी खेत को छोड़ना नहीं चाहिए। अगले कुछ सप्ताह में पौधों की बढ़वार और कल्लों की स्थिति लगातार देखते रहें।
खेत में किसी हिस्से में पौधे अचानक पीले पड़ रहे हों, पत्तियों पर असामान्य निशान दिखाई दें या कीट का प्रकोप दिखे तो समस्या की सही पहचान करें।
बिना पहचान के बार-बार कीटनाशक या खाद डालने से बचना चाहिए।
30वें दिन किसान ये 5 काम जरूर देखें
धान की इस अवस्था को आसान तरीके से याद रखना हो तो इन पांच बातों पर ध्यान दें:
- खेत में खरपतवार की स्थिति जांचें और जरूरत के अनुसार नियंत्रण करें।
- पौधों की बढ़वार और कल्लों की संख्या देखें।
- पानी बहुत ज्यादा जमा है तो जल निकासी की स्थिति देखें।
- खाद डालने से पहले मिट्टी और पहले दिए गए पोषक तत्वों को ध्यान में रखें।
- पत्तियों, तनों और पौधों पर कीट या रोग के लक्षण दिखाई दे रहे हैं या नहीं, यह जांचें।
धान की रोपाई के करीब 30 दिन बाद का समय फसल की बढ़वार के लिए महत्वपूर्ण है। इस समय केवल यूरिया डालने पर ध्यान देने के बजाय पूरे खेत की स्थिति देखना ज्यादा जरूरी है।
सबसे पहले खरपतवार को नियंत्रित करें, फिर पानी की स्थिति जांचें और उसके बाद फसल की जरूरत के अनुसार संतुलित पोषण का फैसला करें। मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि सलाह के आधार पर खाद की मात्रा तय करना सबसे सुरक्षित तरीका है।
धान में ज्यादा और मजबूत कल्ले पाने का कोई एक जादुई उपाय नहीं है। सही रोपाई, समय पर निराई-गुड़ाई, संतुलित खाद और सही पानी प्रबंधन को मिलाकर ही स्वस्थ फसल तैयार होती है।


